कर्ज की प्रकृति को समझो! Loan!!depth आपने देखा होगा कर्ज का कारक मंगल माना गया है ।अधिकांश लोग सिर्फ जब कुंडली दिखाने जाते है तो ज्योतिषि उनको मंगल के उपाय बता देते है लेकिन क्या ये सही है ? देखिये मङ्गल को कर्ज का कारक मानने का जो लॉजिक है , कि मङ्गल छठे भाव का नैसर्गिक कारक है जिस वजह से कर्ज, ब्याज ऋण ये सब उसके अंदर आते है । अब क्या सिर्फ मङ्गल के पीछे पड़े रहने से आपका कर्ज खत्म हो जाएगा नही कभी नही ये सबसे बड़ी बेवकूफ़ी है । देखिये गुरु धन का कारक है अब कर्ज की किश्त जमा करनी है तो धन भी होना चाहिए इसलिए रीपेमेंट हम गुरु से देखते है ।अब कर्जा कितनी अच्छे ढंग से आपका जाएगा वह मैनेजमेंट करना आपको बुध सिखाता है ।नैचुरली बुध यानी गणेश जी और गणेशजी जी कृपा की रहे तो विघ्न भी नही आने वाले आपके काम मे। बुध आपको एक अच्छा मैनेजमेंट देता है जिससे आप कैलक्यूलेट करके अपना काम समय से कर सकते है । अब देखिये आपने कर्ज किस लिया लिया है ? जैसे भूमि के लिए लिया है तो मङ्गल के उपाय काम चला देंगे लेकिन उस भूमि में बने घर के इंटीरियर डिजाइन के लिए लिया है फिर मङ्गल नही फिर शुक्र काम में आ जायेगा ।...
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Showing posts from February, 2023
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आपकी कुंडली मे सबसे बलवान कौनसा ग्रह है उसका प्रभाव आपके पूरे जीवन मे अधिकतर रहेगा यह मैंने सैकड़ो कुंडलियो में लगाकर देखा इससे वाकई में बहुत अच्छे रिजल्ट्स मिले मुझे। यह मैंने तब खोजा जब में नक्षत्र को एडवांस रूप से हमारे जीवन पर उनका फ़लित ढूंड रहा था । में इसे आसानी से समझाता हु आपको। देखिये आपको पता है हमारे 9 ग्रह है ।औऱ कुछ अप्रकाश ग्रह है। वैसे ही 27 नक्षत्र है ।अब कोई भी ग्रह आपकी कुंडली मे कही न कहीं किसी न किसी भाव मे बैठा होगा और किसी न किसी राशि मे भी जरूर होगा ।अब वह अगर राशि मे है तो।किसी न किसी नक्षत्र में भी बैठा होगा । अब आप क्या करे पहले नवग्रहो को line से लिख दीजिएः फिर ये लिखे की वो किस नक्षत्र में बैठे है । जैसे सूर्य कृतिका नक्षत्र में बैठा है ,शुक्र विशाखा में ऐसे ही सब ग्रहो के आगे लिख दीजिएः की कौनसा ग्रह किस नक्षत्र में है। (नोट एक ग्रह को तीन नक्षत्र प्राप्त है). अब ये देखिये की ऐसा कौनसा ग्रह है जिसके नक्षत्रो में ज्यादा ग्रह बैठे है ।ex गुरु के नक्षत्र में राहु भी है , शुक्र भी है ,मंगल भी है मतलब गुरु ऐसा ग्रह हुआ जो ज्यादा बार आया ।इस ग्रह को नोट कर...
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माया कैसे रची जाती है भाग -2 9 ग्रहो की दशाओ का प्रैक्टिकल फल अब राहु आता है महादशा में वो कहता है चल जल्दी से हासिल कर इन सभी चीजो को चाहे कुछ भी करना पड़े ,फिर व्यक्ति की बुद्धि पर अधिकार स्थापित करता है और वो उस भौतिक वस्तु को प्राप्त करने के लिए जी जान लगाता है ,अब वह अगर उसके योग्य हुआ तो ठीक वरना दुष्कर्म करके ही हासिल करवा देगा । लेकिन याद रहो सुख नही देगा सिर्फ illusion देगा । इतने में गुरु देव आ जाएंगे भरपाई करने व कहेंगे जो किया सो किया अभी भी वक़्त है सुधर जा ।गुरु कहते है समय रहते आ गया हूं हर किसी की कुंडली मे तो आ भी नही पाता हूं ,चल किसी गुरु को शरण पकड़ ले ,थोड़ा भक्ति भाव कर ले फिर जाकर, तेरे जो हालात हुए है पिछले दशा में एक मौका दे रहा हु कर्मो का पश्चाताप करने के लिए। फिर इतने में जी शनि देव आते है कहते है बेटा 2 दशा तूने भोग ली चल अब उसका हिसाब कर लेते है अब जिनके पूर्व दो दशाय बढ़िया गई वो शनि की दशा में सीखता है और सिर्फ प्रैक्टिकल ज्ञान लेता है और शनि अपनी दशा में ये बोध जरूर कर देते है कि खुद से बढ़कर अपना कोई सहारा नही है ।जमकर मेहनत कराएंगे बदन तोड़ परिश्...
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केतु का उद्देश्य समझो :::::: जैसा आज के समय मे केतु को वैरागी ,साधु संत घर से दूर भाग जाने वाला कह रहे है ऐसा नही है केतु। मेरे अनुसार केतु का मुख्य उद्धेश्य यह है कि इन भौतिक सुखों में तुम इतना मत खो जाओ की तुम अपना main लक्ष्य ही भुल जाओ। क्योंकि भौतिक वस्तुएँ भी जीवन व्यापान करने के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन ये भौतिक सुख तुम्हे सिर्फ जब तक तुम जीवित हो तब तक ही मिलेंगें बस जो तुम अपने साथ ले जा सकते हो वो है नेक कर्म, आध्यत्म, भक्ति.,यही केतु है वरना इसी वजह से वो एक उबासी और भूतकाल में उस काम को already अच्छे से कर लिया है ऐसा अनुबह्व देता है ओर ऐसी feeling आप मे आ सकती है कि क्या करना इस काम को छोड़ो में इसमें पहले ही master हु ,और ये भाव अनुसार करता ही है ।जैसे लग्न में होगा तो ऐसे व्यक्ति एक complete man हो सकता है पिछले जन्म में क्यूंकि केतु जिसको अन्तर्ज्ञानी बना दे वो complete man ही हो सकता है इसलिए इस जन्म में लग्न में बैठने में कई ups and downs देगा ।वैसे ही धन भाव मे बैठने से ये आपको परिवार और धन संभंधित अप्रत्याशित फल दे सकता है ,यानी अजीब सी फीलिंग।मेरे अनुसार इसक...
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12 भावो की माया 12 भावो की गाथा लग्न तो बेचारा कर्ता है सब इसे ही भोगना है ।ये आपको बताता है कि क्या तेरा मकसद है ,उस मकसद को पूरा करने के लिए बल है भी या नही ।क्योंकि ये भाव आप हो ,लग्न छोड़कर जितने भी भावो से सुख दुख प्राप्त होंगे वह इसे ही झेलने है द्वितीय और सप्तम भाव से ऐसा समझो जो व्यक्ति जिसको सबसे कीमती या प्रिय समझता हैं वह बस temporary है। क्योंकि इसके होने के बाद भी व्यक्ति सुखी नही है।चाहे धन हो या पति- पत्नी ,परिवार आदि।इसकी असलियत तो ये है कि व्यक्ति बड़ी आशा से पहले इसको प्राप्त करने के पीछे भागता है और जब प्राप्त हो जाता है तो सोचता है मुझे सुख मिलेगा लेकिन वो और ज़िम्मेदारियों के तले दब जाता है तीसरा भाव एकादश भाव तो दिखावा है ये नकली इच्छाओं की पूर्ति कराएगा जो चंद समय का भौतिक सुख देगा और समय बीतते ही फिर चले जाएगा और नकली धन संपत्ति की तरफ आपको प्रतिस्पर्धा कराएगा।ये इतना काम की भावना पैदा करेगा कि फिर आप अपना अट्टाचमेंट ही नही कम कर पाओगे इस दुनिया से,ये दुनिया की तरफ आपको attraction देता है आप इसके पीछे भागते है। वही चतुर्थ भाव ,अष्टम और द्वादश भाव आपको जिंदगी ...
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माया कैसे रची जाती है आपको पहले शनि की दशा दी जाती है जिसमे आप खुलकर मेनहत करते हो ,थोड़ा असन्तोष भी रहता है बदन तोड़ परिश्र्म करके जो कमा पाते हो फिर वैसे ही बुध की दशा लग जाती है।बेचारे इसमें पूरा मैनेजमेंट लगाते हैं नई नई तरकीब लगाते है कि उस धन को कैसे इखट्टा करा जाय और इसमें ही सालों बीत जाते है फिर आते है उतने में ही केतु महाराज जो कहते अरे मूर्ख क्या लगा पड़ा है इस माया में, बाहर निकल तू उस मार्ग में चल जिसमे में तुझे बताता हूं इसमें तुझे परमाननंद मिलेगा इतने में व्यक्ति थोड़ी अन्तर्ज्ञानी बनने के तरफ रुख करता है और अब शुक्र आ जाते है वो कहते है तू क्या काम कर रहा है पागल भगवान को किसी ने देखा है क्या ? बड़े मुश्किल से मनुष्य जीवन मिलता है full मजे कर इसमें जो होगा देख लेंगे वैसे भी इतजे जन्मों से भी तो भटक ही रहे है । बस यही घटनाक्रम चलता रहता है यही माया है और कुछ विशेष नही है
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लग्न ही तो महत्वपूर्ण है -लग्न भाव ही तो केंद्र भी है त्रिकोण भी है । सिर्फ लग्न ही तो भोगी है,इसको ही समस्त वस्तुओ का भोग करना है ,चाहे छठे भाव की जिम्मेदारी भी इसी ने निभानी है ,दशम से कर्म का भोग भी इसे ही करना है, तृतीय से पराक्रम भी इसी ने करना है ,चतुर्थ ,नवम भाव से मत पिता का सुख भी इसे ही भोगना है ,बारवे से हानि भी इसको ही झेलनी है ,कुल मिलाकर लग्न की महत्वता को समझो इस जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में लग्न ही सबसे जरूरी है ,अगर लग्न ही कमजोर हो गया तो उदेश्य आपके पूरे ही नही हो पाएंगे ।फिर जितना मर्जी वर्ग कुंडलियों में उलझ जाओ उत्तर नही ढूंढ पाओगे ,सुख दुख सब लग्न को ही झेलने है और किसी को नही,लग्न बलवान है तो वह कहावत आपके लिए सही है कि जो आप सोच सकते हो वह कर सकते हो वरना सोचते ही रह जाओगे।
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शरणागति समर्पण भाव। जब विभीषण अपना सब कुछ त्यागकर भगवान राम की शरण मे जाता है तो पता है है भगवान क्या कहते है ? भगवान कहते है - जो एक बार मेरी शरण मे आकर( में तुम्हारा हु) ऐसा कहकर मुझसे अभय चाहता है,उसको में सभी भूतों का अभयदान देता हूं यह मेरा व्रत है ।अर्थात जितने जन्म से हम भटके आ रहे है जितने पाप किये आ रहे है एक मात्र शरणागत हो जाने से में तुम्हे हर चीज से मुक्त कर दूंगा।तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो
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मैंने अभी तक उपाय के ऊपर एक या दो ही पोस्ट करी होगी मुश्किल से । इसका मतलब ये नही की में उपाय का विरोध करता हु ।अगर कोई समस्या है तो उसका निदान भी है ,क्योंकि everything is possible । आप doctor के पास जाते है कंसल्ट कराने के लिए की क्या बीमारी है कहा दिक्कतें आ रही है ? तो अगर डॉक्टर बस आपके कुछ टेस्ट करवा लें , stethoscope लगा ले उसके बाद आपको कहता है कि आपको टायफॉइड हो गया है बस अब आप घर जाय, ? क्या बस आप डॉक्टर से कुल मिलाके बीमारी या उसका कारण जानने जाते है या सिर्फ दवाई लेने के लिए । क्योंकि आप खुद सोचिए डॉक्टर ने तो बता ही दिया कि आपको टाइफाइड हो चुका है तो क्या उसके कहने मात्र से आप सही हो जाएंगे? अब अगर कोई आपका रोग पकड़ रहा है तो उसका समाधान भी जानता ही होगा ।उसी प्रकार आप ज्योतिषि के पास जाते है वो कुंडली मे ग्रहो की स्तिथि देख के।आपको उपाय बताता है जैसे आप डॉक्टर से पूछते है इसमें क्या परहेज करना है ,ये बीमारी क्यों हुई क्या कारण है इसका तो डॉक्टर आपको कारण बताता है लेकिन क्या आप ने कभी ज्योतिषि से ऐसे सवाल करे की ये समस्या आयी क्यों ,जाहिर सी बात है अच्छा विद्वान ज्य...
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एक समय था जब लोग शायद अलग से बीजमंत्र का जाप करके बहुत कम ग्रह शांत करते होंगे। उस समय वो केवल एक ही नाम रटते थे दिन मे कई बार एकदूसरे से मिलते जुलते, आते-जाते, उठते-बैठते। एक चबूतरे पर घर के बुजुर्ग बैठे रहते थे और उधर से आते जाते छोटे बडे लोग उनसे राम-राम, जय श्रीराम, सीताराम, राधे राधे करते जाते थे। और ऐसा दिन मे कई बार होता था। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में! मतलब सीधे ही परमपिता का स्मरण वो भी निस्वार्थ। आज .......??? क्या हम लोग कह सकते हैं कि जिनको हम लोग देहाती, अंधविश्वासी कहते थे उन्होने ही अमूल्य परंपराओं , प्रकृति , धर्म को बचाकर रखा था ??
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पुत्र वियोग से हुई देवलोक, पीहर के (ढोली) को दिया पहला पर्चा जैसलमेर जिले के जोगीदास गांव में वि.सं. 1745 को जोगराज सिंह भाटी के यहां एक पुत्री का जन्म हुआ, नाम रखा गया स्वरूप कंवर। मालाणी की राजधानी जसोल के राव भारमल के पुत्र जेतमाल के उत्तराधिकारी राव कल्याण सिंह के पहली पत्नी के पुत्र नहीं होने पर स्वरूप कंवर के साथ उनका दूसरा विवाह हुआ। विवाह के दो साल बाद राणी भटियाणीजी ने बालक को जन्म दिया, जिसका नाम लालसिंह रखा गया। इससे प्रथम राणी देवड़ी के रूठी रहने लगी तो स्वरूप कंवर ने उन्हें विश्वास दिलाते हुए कहा कि मां भवानी की पूजा-अर्चना कर व्रत व आस्था रखें, उनकी मुराद जरूर पूरी होगी। देवड़ी राणी ने स्वरूप कंवर की बातों में विश्वास कर वैसा ही किया, इस पर कुछ समय पश्चात उनके भी पुत्र र| की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि कुछ समय पश्चात एक दासी ने देवड़ी राणी को बहकाया कि छोटी राणी स्वरूपों का पुत्र प्रताप सिंह से बड़ा होने पर वह ही कल्याण सिंह का उत्तराधिकारी बनेगा। दासी बार-बार उनके पुत्र को राजपाट दिलाने के लिए बहकाने लगी। इस पर देवड़ी राणी अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने के लिए च...
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राहु पंचविशन्ति स्त्रोतम श्रीस्कन्दपुराणे राहुस्तोत्रं अस्य श्रीराहुस्तोत्रस्य वामदेव ऋषिः । गायत्री छन्दः । राहुर्देवता । राहुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥ राहुर्दानव मन्त्री च सिंहिकाचित्तनन्दनः । अर्धकायः सदाक्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ॥ १ ॥ रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुमीतिदः । ग्रहराजः सुधापायी राकातिथ्यभिलाषुकः ॥ २ ॥ कालदृष्टिः कालरुपः श्रीकष्ठह्रदयाश्रयः । विधुंतुदः सैंहिकेयो घोररुपो महाबलः ॥ ३ ॥ ग्रहपीडाकरो द्रंष्टी रक्तनेत्रो महोदरः । पञ्चविंशति नामानि स्मृत्वा राहुं सदा नरः ॥ ४ ॥ यः पठेन्महती पीडा तस्य नश्यति केवलम् । विरोग्यं पुत्रमतुलां श्रियं धान्यं पशूंस्तथा ॥ ५ ॥ ददाति राहुस्तस्मै यः पठते स्तोत्रमुत्तमम् । सततं पठते यस्तु जीवेद्वर्षशतं नरः ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे राहुस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ क्या होता है राहु स्त्रोतम राहु स्त्रोतम राहु गृह के दोष को शांत करने का एक अनूठा जाप मंत्र है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार राहु स्त्रोतम के जाप से राहु देवता प्रशन्न होते है और मनवांछित कामना के पूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं। हिन्दू ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रह...
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अनिद्रा और दु:स्वप्न नाश के कुछ प्रभावशाली मन्त्र । अनिद्रा नींद नहीं आना या बार-बार नींद खुल जाने को कहते हैं,और जब गहरी नींद नहीं आती तो बुरे व डरावने स्वप्न आने लगते हैं, उनको दु:स्वप्न कहते हैं । अनिद्रा और दु:स्वप्न का कारण कमजोर (दुर्बल) मन । कभी-कभी मनुष्य का मन किसी प्रकार की घटना से इतना क्षुब्ध हो जाता है कि न तो नींद ही ठीक से आती है और न ही स्वप्न अच्छे आते हैं । यदि थोड़ी नींद आती भी है तो तरह-तरह के डरावने सपने उसका पीछा नहीं छोड़ते हैं । व्यक्ति दु:स्वप्नों से इतना तंग आ जाता है कि वह सोने से भी डरने लगता है । कमजोर मन का कारण है नकारात्मक सोच मनुष्य के मन में उपजे नकारात्मक विचार (भय, क्रोध, ईर्ष्या, अपेक्षा, घृणा, राग-द्वेष, चिन्ता आदि) उसे विचलित, दु:खी और कमजोर बनाते हैं । इस नकारात्मकता से बचने के लिए उसे इन महत्वपूर्ण बातों को जान लेना चाहिए । संसार में परमात्मा के सिवाय और कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मनुष्य को संसार पर भरोसा छोड़कर अपने ऊपर विश्वास करना चाहिए। संसार सदैव परिवर्तनशील है, यहां कोई भी चीज या परिस्थिति स्थायी नहीं है । मनुष्य को ‘अच्छा या बु...
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रुद्राक्षों का महत्व* *************** माना जाता है कि एक बार पृथ्वी पर त्रिपुर नामक एक भयंकर दैत्य उत्पन्न हुआ था । वह बहुत बलशाली और पराक्रमी था । देवताओंके लिये उसे पराजित करना असंभव था ; तब ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि देवता भगवान शिव की शरण में गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना लगने लगे । भगवान शिव के पास ‘अघोर’ नाम का एक दिव्य अस्त्र था । वह अस्त्र बहुत विशाल और तेजयुक्त था । उसे सम्पूर्ण देवताओं की आकृति माना जाता है । त्रिपुर का वध करने के उद्देश्य से शिव ने नेत्र बंद करके अघोर अस्त्र का चिंतन किया । अधिक समय तक नेत्र बंद रहने के कारण उनके नेत्रों से जल की कुछ बूंदें निकलकर भूमि पर गिर गईं । उन्हीं बूंदों से महान रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए । फिर भगवान शिव की आज्ञा से उन वृक्षों पर जो फल लगे उनकी गुठलियों को रुद्राक्ष कहा गया । वैसे भी देखा जाये तो ‘रुद्र’ का अर्थ शिव और ‘अक्ष’ का आँख अथवा आत्मा है । ये रुद्राक्ष अड़तीस प्रकार के कहे गये हैं । माना जाता है कि जो फल शिव प्रभु ने सुर्य के नेत्रों से उत्त्पन करवाये वे कत्थई रंग के थे और उन के बारह भिन्न-भिन्न प्रकार माने ग...