एक समय था जब लोग शायद अलग से बीजमंत्र का जाप करके बहुत कम ग्रह शांत करते होंगे। उस समय वो केवल एक ही नाम रटते थे दिन मे कई बार एकदूसरे से मिलते जुलते, आते-जाते, उठते-बैठते। एक चबूतरे पर घर के बुजुर्ग बैठे रहते थे और उधर से आते जाते छोटे बडे लोग उनसे राम-राम, जय श्रीराम, सीताराम, राधे राधे करते जाते थे। और ऐसा दिन मे कई बार होता था। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में!

मतलब सीधे ही परमपिता का स्मरण वो भी निस्वार्थ।
आज .......???
क्या हम लोग कह सकते हैं कि जिनको हम लोग देहाती, अंधविश्वासी कहते थे उन्होने ही अमूल्य परंपराओं , प्रकृति , धर्म को बचाकर रखा था ??

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