पुत्र वियोग से हुई देवलोक, पीहर के (ढोली) को दिया पहला पर्चा जैसलमेर जिले के जोगीदास गांव में वि.सं. 1745 को जोगराज सिंह भाटी के यहां एक पुत्री का जन्म हुआ, नाम रखा गया स्वरूप कंवर।
मालाणी की राजधानी जसोल के राव भारमल के पुत्र जेतमाल के उत्तराधिकारी राव कल्याण सिंह के पहली पत्नी के पुत्र नहीं होने पर स्वरूप कंवर के साथ उनका दूसरा विवाह हुआ।
देवड़ी राणी ने स्वरूप कंवर की बातों में विश्वास कर वैसा ही किया, इस पर कुछ समय पश्चात उनके भी पुत्र र| की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि कुछ समय पश्चात एक दासी ने देवड़ी राणी को बहकाया कि छोटी राणी स्वरूपों का पुत्र प्रताप सिंह से बड़ा होने पर वह ही कल्याण सिंह का उत्तराधिकारी बनेगा।
दासी बार-बार उनके पुत्र को राजपाट दिलाने के लिए बहकाने लगी। इस पर देवड़ी राणी अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने के लिए चिंतित रहने लगी।
श्रावण पक्ष की काजली तीज के दिन राणी स्वरूप कंवर ने राणी देवड़ी को झुला झूलने के लिए बाग में चलने को कहा तो उन्होंने बहाना बनाते हुए मना कर दिया, तब राणी स्वरूप अपने पुत्र लालसिंह को राणी देवड़ी के पास छोड़कर झूला झूलने चली गई।
इस अवसर को देखते हुए उसने विश्वासपात्र दासी को जहर मिला दूध लेकर बुलाया, कुछ समय बाद खेलते-खेलते दूध के लिए रोने लगा तो दासी ने जहर मिला दूध लालसिंह को पिला दिया। इससे लालसिंह के प्राण निकल गए।
राणी स्वरूप कंवर जब झूला झुलाकर वापस आई तो अपने पुत्र के न जागने पर व उसे मृत देखकर पुत्र वियोग में व्याकुल हो गई
1775 माघ सुदी द्वितीया को उनका स्वर्गवास हो गया।
एक दिन राणी भटियाणीजी के गांव से दो ढोली शंकर व ताजिया रावल कल्याणमल के यहां जसोल पहुंचे।
उन्होंने बाईसा से मिलने का कहा तो राणी देवड़ी ने उन्हें श्मशान में जाकर मिलने की बात कही। इससे दुखी होकर ढोली गांव के श्मशानघाट पर जाकर बाईसा से विनती करने लगे और आप बीती सुनाई।
इस पर प्रसन्न होकर राणी भटियाणीजी ने दोनों को साक्षात दर्शन देकर पर्चा दिया और दमामियों को उपहार स्वरूप नेक भी दी।
इसे लेकर वे वापस रावल के यहां पहुंचे तो एकबारगी सभी अचरज में पड़ गए, लेकिन कुछ ही दिनों में यह बात आस-पास के गांवों में फैल गई।
इस पर रावल कल्याणमल कुछ लोगों के साथ श्मशानघाट पहुंचे....
तो वहां पर खड़ी खेजड़ी हरी-भरी नजर आई।
इस पर उसी जगह राणी भटियाणीजी के चबूतरे पर एक मंदिर बनवा दिया और उनकी विधिवत पूजा करने लगे। मंदिर में गोरक्षक सवाईसिंहजी, लाल बन्ना, कल्याणसिंह, बायोसा आदि की भी पूजा की जाती है।
स्वरूप कंवर जी को रानी भटियाणी जी, माजीसा, भुआसा आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है.. माजीसा का विख्यात मंदिर बाड़मेर के जसोल गांव में है जिसे जसोल धाम के नाम से जाना जाता है।
प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन माह के नवरात्र में वैशाख, भाद्रपद और "माघ महीनों की शुक्ल पक्ष की तेरस व चवदस को यहाँ श्रद्धालु आते हैं। मनौती पूरी होने पर जात देते है 'कांचळी', 'लूगड़ी', 'बिंदिया और चूड़ियां राणी भटियाणी के भक्त जन चढ़ाते हैं।
राजस्थान ही नहीं भारतवर्ष के हर कोने से यहाँ पर श्रद्धालु आते हैं।
चमत्कार तो विश्वविख्यात है उनका उल्लेख नहीं किया जा सकता है... यकीन ना हो तो
सच्चे मन से अहंकार, कटुता, ईर्ष्या जैसे गुणों को त्याग कर कुछ मांगना.....
माता के जन्मदिन पर हर साल भरता है बड़ा मेला
भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी पर माता राणी भटियाणी के जन्म दिवस पर जसोल में बड़े मेले का आयोजन होता है। इसमें राजस्थान सहित गुजरात, महाराष्ट्र से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
त्रयोदशी पर दर्शन की महात्म्य को लेकर रात में 2 बजे से ही श्रद्धालु कतारों में लग जाते हैं, ताकि सुबह की आरती के साथ प्रथम दर्शन कर सकें। जसोल में आयोजित बड़े मेले में दर्शन के लिए तड़के से ही श्रद्धालुओं की कतारें लगने शुरू हो जाती है।
पश्चिमी राजस्थान के शक्तिपीठ स्थलों में से माता राणी भटियाणी में मनोकामनाएं पूर्ण होने पर लोग घुटनों के बल दर्शन करने के लिए पहुंचते है।
.
नवविवाहित दंपति सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए आते और कुछ लोग नवजातों के झडूले उतारकर स्वस्थ व समृद्ध जीवन की प्रार्थना करने आते....
जसोल. माता की शृंगारित प्रतिमा।
रातभर ज्योत जलाकर दिया माता का रातीजोगा
मनोकामनाएं पूर्ण हाेने पर तेरस की पूर्व रात्रि ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती।
श्रद्धालू मां की ज्योत जलाकर रात भर संकीर्तन करते, वहीं सुबह दर्शन पूजन के साथ प्रसादी का भोग लगाकर श्रद्धालुओं में वितरित होता।
बड़े मेले को लेकर श्री माता राणी भटियाणी मंदिर संस्थान की तरफ से रहने, खाने-पीने, सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए जाते
Comments
Post a Comment