-लग्न भाव ही तो केंद्र भी है त्रिकोण भी है ।
सिर्फ लग्न ही तो भोगी है,इसको ही समस्त वस्तुओ का भोग करना है ,चाहे छठे भाव की जिम्मेदारी भी इसी ने निभानी है ,दशम से कर्म का भोग भी इसे ही करना है, तृतीय से पराक्रम भी इसी ने करना है ,चतुर्थ ,नवम भाव से मत पिता का सुख भी इसे ही भोगना है ,बारवे से हानि भी इसको ही झेलनी है ,कुल मिलाकर लग्न की महत्वता को समझो इस जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में लग्न ही सबसे जरूरी है ,अगर लग्न ही कमजोर हो गया तो उदेश्य आपके पूरे ही नही हो पाएंगे ।फिर जितना मर्जी वर्ग कुंडलियों में उलझ जाओ उत्तर नही ढूंढ पाओगे
,सुख दुख सब लग्न को ही झेलने है और किसी को नही,लग्न बलवान है तो वह कहावत आपके लिए सही है कि जो आप सोच सकते हो वह कर सकते हो वरना सोचते ही रह जाओगे।
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