(((( सात घड़ा धन ))))
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एक प्रेरणादायक कहानी...
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एक बार एक नाई कहीं जा रहा था। जाते-जाते एक जगह एक पेड़ के नीचे अचानक उसे सुनायी दिया, जैसे कोई मानो कह रहा है, ‘सात घड़ा धन लेगा ?’
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परंतु सात घड़ा धन की बात सुनकर उसके मन में लालच पैदा हुआ और वह जोर से बोल उठा- ‘हाँ, लूँगा !’
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त्योंही उसे फिर वही आवाज सुनायी दी- ‘अच्छा, तेरे घर पर रख आया हूँ, जा, ले- ले।’
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नाई ने घर आकर देखा, सचमुच ही सात घड़े रखे हुए हैं।
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उसने सब घड़ों को खोलकर अच्छी तरह देखा, तो उसे दिखायी दिया कि छह घड़े तो सोने की मुहरों से भरे हैं, पर सातवाँ घड़ा कुछ खाली है।
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उसके मन में सातवें घड़े को भी पूरा भरने की तीव्र इच्छा उठी और उसने घर में जितना भी धन, गहने आदि थे, वह सब लाकर उस घड़े में डाल दिया।
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पर भला इतने से वह घड़ा कैसे भरता! घड़े को पूरा भरने के लिये नाई बड़ा व्याकुल रहने लगा।
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घर- गृहस्थी के खर्च में कटौती करते हुए वह बचा हुआ सारा धन घड़े में डालने लगा। पर वह घड़ा भरता ही न था।
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अन्त में उसने राजा से प्रार्थना की कि उसे जो वेतन मिलता है, उससे उसका गुजारा नहीं हो पाता, दया करके वेतन बढ़ा दिया जाय।
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राजा उस नाई पर खुश था। उसके कहते ही राजा ने वेतन दुगुना कर दिया। पर नाई की दशा पहले जैसी ही रही।
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अब तो वह लोगों से माँगकर खाता और पूरा वेतन घड़े में डाल ‘देता। पर घड़ा था कि भरने का नाम ही नहीं लेता।
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दिनों- दिन नाई की हालत को बिगड़ते देख एक दिन राजा ने पूछा :-
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‘ लिए क्यों रे! तुझे जब कम वेतन मिलता था, तब तो तेरी गुजर- बसर अच्छी तरह से हो जाती थी, और अब दुगुना वेतन पाकर भी तेरी ऐसी दशा क्यों है ?
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तू क्या सात घड़ा धन ले आया है?’
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नाई ने हक्का- बक्का होकर कहा- राजन, आपको किसने बताया ?’
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राजा ने कहा ‘अरे, वह तो यक्ष का धन है।उस समय यक्ष ने आकर ‘मुझसे भी पूछा था, ‘सात घड़ा धन लोगे ?’
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मैंने पूछा ‘वह धन जमा करने के लिये है, या खर्च करने के लिये ?’ तब वह बिना उत्तर दिये भाग गया।
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वह धन कभी नहीं लेना चाहिये, उसे खर्च नहीं किया जा सकता, सिर्फ जमा ही करना पड़ता है।
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तू भला चाहता है तो जल्दी वह धन लौटा आ।’
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